रेलम पेल है, रेलम पेल

बचपन में पढा था लोकतंत्र के चार सतम्भ हैं- [१] विधायिका [२] कार्यपालिका[३] न्यायपालिका ,और ४] मीडिया

तो दिल मीडिया को उतनी ही इज्जत बख्शता था, जितनी की ऊपरवाले को, भई लोकतंत्र का चौथा सतम्भ जो ठहरा। परन्तु आज के परिवेश में मीडिया को देखता है तो दिल कह उठता है:

रेलम पेल है, रेलम पेल

रेलम पेल है, रेलम पेल!!!

आचारों की व्यवहारों की,

विचारों की, संस्कारों की,

मण्डी लगी हुई है, भाई!

जो जी चाहे ले जाओ,

मारो ऊपर से तड़का।

बनाओ भाजी -तरकारी,

या फिर बनालो भरता॥

पर सच्च का दम ना भरना,

ये सच्च है ऊँगली करता।

– रश्मि जिंदल

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