नज़रिया

नज़रिया

मेरी हज़ार कोशिशों के बाद भी,

मेरे अंदर की कमियां कभी दूर नहीं कर पाती हूँ,

और तुम बने रहते हो पहलाज निहलानी!

लिख ही नहीं पाती  कभी मैं,

अपनी ही कहानी में , अपनी कहानी!

माना, सौ खोट होंगे मुझमे,

पर तुम कैसे इतने श्योर हो की तुम सबसे ख़ास हो?

माफ़ करना छोटा मुंह बड़ी बात,

पर क्या कभी मुझसे ध्यान हटाकर,

अपने भीतर झाँका है?

क्या पता कोई एक – आध खोट तुम में निकल आये,

क्या पता कोई एक चीज़ तुम्हारी बदल देने से,

मेरे अंदर की हज़ार कमियां चुटकी में सुधर जाएँ?

जैसे की मुझे देखने का तुम्हारा नज़रिया…

देखो न कभी मुझे मेरे तन से हटकर,

एक इंसान की तरह

नज़रिया बदल  कर तो देखो

तुम्हारी नज़र भी बदल जायेगी,

फिर एक छै साल की लड़की में

तुम्हे एक बच्ची नज़र आएगी,

जिसकी आँखों में तुम्हे नज़र आएगी मासूमियत,

क्या उन मासूमियत से भरी आँखों को देखकर भी

तुम्हारी नज़र हवस से भर जायेगी ?

नहीं न…

फिर क्यों

कपडे, हंसी, घर से बहार निकलना, पढ़ना, आगे बढ़ना, मन की करना ….

ऐसी हज़ार चीज़ें बदलने पे तुले हो तुम?

जबकि सब कुछ एक चुटकी में ठीक हो सकता है

एक महज़ बदल देने से तुम्हारा नज़रिया !!

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