कुछ अनजान नज़रें

कुछ अनजान नज़रें

कुछ अनजान नज़रें

पीछा करती हैं

टटोलती हैं कुछ

फ़िर, अचानक कहीं

ठहर जाती हैं,

गहरे भीतर तक गड़ जाती हैं।

अच्छा नही लगता

उनका यूं मेरे

बदन से खेलना

घिन्न आती है

और तरस भी

कि नही हुआ सशक्त

ये मुंआ इस बरस भी॥

 

– रश्मि जिंदल

 

© Rashmi Jindal, www.RashmiJindal.com, 2016

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