शाम के बाद सहर

एक बार अकबर ने बीरबल से कुछ ऐसा लिखने को कहा जिसे खुशी में पढ़ो तो गम हो और गम…

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इस कद्र बेफिक्री हो

इस कद्र बेफिक्री हो इस कद्र बेफिक्री हो ओरत के लिए , कि उसे स्वयं का अस्तित्व बनाने  पे शर्माना न पड़े ! गर कोई और करता है उसकी आबरू को तार-तार, तो शर्मसार हो वो दरिंदा ओरत को मुह छिपाना न पड़े हो जाये कुछ ऐसा कि रहे वो इंसान ही, हमें ओरत को देवी या महान  बनाना न पड़े ! इस कद्र बराबर हो जाएँ सब इस जहाँ में, कि अपने अधिकार के लिए हर बार ओरत को चिल्लाना न पड़े !! एक ओरत होने के नाते मेरी…

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एक अजीब सा डर

एक अजीब सा डर एक अजीब सा डर हर वक्त घेरे रहता है, कुछ खो देने का डर………. ‘जो लिया…

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